Tulsidas

Tulsidas- तुलसीदास की कथा तुलसी जल के समान है Leave a comment

Who was Tulsidas?

Tulsidas  जी को गोस्वामी तुलसीदास  के नाम से भी जाना जाता है। वे एक हिन्दी वैष्णव संत और विश्व प्रसिद्ध कवि थे।इन्हे भारतीय इतिहास  के सर्वश्रेष्ठ कवियों मे से एक माना जाता है।


तुलसीदास  जी भगवान राम के अनन्य भक्त थे, उनकी रचना रामचरितमानस को हिन्दू धर्म के ग्रंथों में उच्च स्थान प्राप्त है।

उन्होंने अपनी रचनाएँ मूल रूप से संस्कृति और अवधि भाषा में की हैं।


हनुमान जी के कारण ही मिले थे तुलसीदास जी को श्री राम. जाने हनुमान चालीसा का महत्व जो राम से मिला देते हैं.

When was Goswami Tulsidas Born?

गोस्वामी Tulsidas  जी का जन्म शुक्ल पक्ष के सप्तमी के दिन हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार इनका  जन्म 1532 मे बताया जाता है.

परंतु विक्रम संवत के अनुसार इनका  जन्म 1555 मे हुआ बताया जाता है।इनके जन्म स्थान  को लेकर आज भी सही जानकारी किसी को नहीं है.

कुल सात जगहों पर लोग इनके जन्म का दावा करते है। 2012 मे उत्तर प्रदेश सरकार ने इनका जन्म  स्थान सोरोन को घोषित किया।

Tulsidas was related to which ruler

तुलसी दास जी के जीवन काल में भारतवर्ष  में बादशाह अकबर की हुकूमत थी।

Tulsidas Hanumanएकबार अकबर ने सुना की कोई Tulsidas  नामक संत चमत्कार से मृत को भी जीवित कर देता है।

ये चमत्कार देखने के लिया उसने Tulsidas  जी को अपने दरबार में पेश करवाया और उनके सामने एक मृत शरीर को रख दिया।

गोस्वामी जी ने ऐसा कोई  चमत्कार न जानने  की बात कही और कहा मैं  बस एक ही बात जानता हूँ वो है “राम”।

बादशाह की बात न मानने पर उन्हें फतेहपुर सिकरी में कैद कर लिया गया।

Download Tulsidas Bhajan

Why Tulsidas wrote hanuman chalisa?

Tulsidas  जी ने अकबर के सामने झुकने से इनकार कर दिया।कैद के दौरान उन्होंने हनुमान जी के भक्ति में हनुमान  चालीसा की रचना की।

चालीस  दिन तक वे हनुमान चालीसा का जाप करते रहे ।एक दिन अचानक वानरों की बहुत बड़ी फौज ने फतेहपुर सिकरी पर हमला बोल दिया.

शहर के हार कोने पार उन्होंने आफत मचा दिया। बूढ़े हाफिज़ ने Tulsidas  जी के चमत्कार की बात अकबर को बताई।

तत्पश्चात बादशाह अकबर ने नतमस्तक होकर गोस्वामी जी से क्षमायाचना की।

तुलसीदस जी ने वानरों को वापस भेज  दिया और बादशाह को फ़तेहपुर छोड़ने का आदेश दिया।

इसके बाद Tulsidas  जी और बादशाह अकबर मे मित्रता हो गयी।

When did Tulsidas wrote Ramcharitmanas?

विक्रम संवत 1631 मेख Tulsidas  जी ने अयोध्या में रामचरितमानस की रचना आरंभ की । वह दिन   चैत्र महीना का नवमी था यानी वह रामनवमी का दिन था।

इस दिन भगवान राम का जन्म दिवस मनाया जाता है।

इस ग्रंथ की रचना में उन्हें दो साल सात महीने छब्बीस दिन का समय लगा। विक्रम संवत 1633 के विवाह पंचमी के दिन अर्थात भगवान श्री राम के विवाह के दिन इनकी रचना पूर्णरूप से पूरी हो गयी।

What was the difference between Tulsidas Ramayana and Valmiki Ramayana?

वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना त्रेतायुग में की थी। उन्होंने संस्कृत के श्लोकों के रूप में उसकी रचना की थी ।उसके कुल सात भाग है जिन्हें सात “काण्ड “के नाम से जाना जाता है।

Tulsidas  द्वारा रचित रामचरितमानस की रचना मुग़ल काल में की गयी थी।इसमे अवधीभाषा के चौपाई का प्रयोग किया गया है।

इसमें भी कुल सात कांड है, केवल युद्ध कांड का नाम बदल कर लंका कांड कर दिया गया है।

What are the famous lines from Ramcharitmanas by Tulsidas?

रामचरितमानस के कुछ दोहे –

कवन सो काज कठिन जग माही।

जो नहीं होइ तात तुम पाहीं।।’

सुनि प्रभु वचन हरष हनुमाना।

सरनागत बच्छल भगवाना।।’

‘जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं।

सुख संपत्ति नानाविधि पावहिं

Tulsidas ka jivan parichay?

लोगों का मानना है की Tulsidas  जी का जन्म बारह माह माँ के गर्भ में रहने के बाद हुआ था। रोने के बजाए राम का नाम लेते हुए वो इस धरती पर आए थे.

इसलिए उनका  नाम रामबोला रखा गया था। जन्म के समय ही उनके 32 दांत थे।

बुरे नक्षत्र मेख जन्म होने की वजह से उनके माता  पिता ने जन्म चौथी रात ही उनका त्याग कर दिया। उनकी नौकरानी चुनिया ने 5 साल तक उनकी देख रेख की और फिर चल बसी।

रामबोला अनाथ  हो गया  और दर दर भीख मांगने लगा।

5 वर्ष की आयु में उनकी मुलाक़ात नरहरीदास से हुई,उन्होने रामबोला को दीक्षा दी और विरक्ता दीक्षा के बाद उनका नाम Tulsidas  रखा गया।

उन्होंने अपनी शिक्षा अयोध्या मे शुरू की। Tulsidas  ने वाराणसी में संस्कृत व्याकरण समेत चार वेदों का ज्ञान लिया और  6 वेदांग का अध्ययन भी किया.

वे बचपन से ही तीव्र और कुशाग्र बुद्धि के थे उनमें सीखने की क्षमता इतनी प्रबल थी कि Tulsidas  जी ने हिन्दी साहित्य और दर्शनशास्त्र का अध्ययन प्रसिद्ध गुरु शेषा सनातन से लिया।

एक बार जब Tulsidas  अपनी कथा सुनाने में मग्न थे तभी  पंडित दीन बंधु पाठक ने उन्हें देखा और उनकी कथा से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होनें अपनी पुत्री का विवाह Tulsidas  जी से करवा दिया।

महान कवि तुलसीदास जीवनी

Tulsidas  जी की  पत्नी ने उन्हें राम के प्रेम का असली मतलब समझाया था।उन्होनें पूरे भारत में तीर्थ यात्रा की वे बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम और हिमालय में लोगों के बीच गए.

वहां श्री राम के पावन चरित्र से लोगों को अवगत कराया ।

Tulsidas  जी ने अपने कई रचनाओं में उल्लेख भी किया है कि भगवान राम के प्रबल भक्त हनुमान जी से उन्होंने कई बार मुलाकात भी की इसके साथ ही उन्होनें वाराणसी में भगवान हनुमान के लिए संकटमोचन मंदिर की भी स्थापना भी की थी।

भगवान राम की अटूट और प्रबल भक्ति और हनुमान जी के आशीर्वाद से  Tulsidas  जी को  चित्रकूट के अस्सी घाट में भगवान श्री राम के दर्शन हुए।

कमदगीरि पर्वत की परिक्रमा करने के दौरान , वहाँ  उन्होंने घोड़े की पीठ पर दो राजकुमारों को देखा, वे उनको पहचान न  सके।

बाद में उन्होंने पहचाना कि वो हनुमान जी  की पीठ पर राम-लक्ष्मण बैठे थे, वे बेहद दुखी हो गये।

अगली सुबह, उनकी मुलाकात दोबाराश्री राम से हुई,   Tulsidas  जी  चन्दन घिस रहे थे तभी भगवान श्री राम  और लक्ष्मण ने उन्हें दर्शन दिए और उनसे तिलक करने के लिए  कहा ।

उनके दिव्य दर्शन से  Tulsidas  जी मंत्रमुग्ध हो गए और तिलक करना भूल गए। भगवान श्रीराम  ने खुद स्वयं का तिलक किया और  Tulsidas  जी के माथे पर लगाया।


उस क्षण को उन्होंने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताया है।

When Tulsidas Died?

Tulsidas  के काफी सालों से बीमार रहने के कारण  सावन में  संवत 1623 में उन्होंने अपना देह त्याग ।

अपने अंतिम समय गंगा नदी के किनारे अस्सी घाट पर तुलसीदस जी  ने राम-नाम का स्मरण किया था।

ऐसा कहा जाता है कि  Tulsidas  ने अपने मृत्यु से पहले आखिरी कृति विनय-पत्रिका  लिखी थी जिस पर खुद प्रभु राम ने हस्ताक्षर किए थे।

tulsidas Mahima

Top 10 Tulsidas ke dohe ?

1.तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर ।

बसीकरन इक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ।

Tulsidas  जी कहते हैं कि मधुर वाणी सभी ओर सुख प्रकाशित करती हैं और यह हर किसी को अपनी और सम्मोहित करने का कारगर मंत्र है इसलिए हर मनुष्य को कटु वाणी त्याग कर मीठे बोल बोलने चाहिए ।

2.काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान ।

तौ लौं पण्डित मूरखौं, तुलसी एक समान ।

Tulsidas जी कहते हैं कि जब तक काम, क्रोध, घमंड और लालच व्यक्ति के मन में भरे पड़े हैं, तब तक ज्ञानी और मूढ़ व्यक्ति के बीच कोई अंतर नहीं होता है, दोनों ही एक जैसे हो जाते हैं ।

तुलसीदास जी के प्रसिद्द दोहे हिंदी अर्थ सहित

3.तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर ।

सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि ।

Tulsidas  जी कहते हैं कि सुंदर परिधान देखकर न सिर्फ मूढ़ बल्कि बुद्धिमान मनुष्य भी झांसा खा जाते हैं । जैसे मनोरम मयूर को देख लीजिए उसके वचन तो अमृत के समरूप है लेकिन खुराक सर्प का है ।

4.बचन वेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि ।

सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि ।

Tulsidas  कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को उसकी मीठी वाणी और अच्छे पोशाक से यह नहीं जाना जा सकता की वह सज्जन है या दुष्ट । 

बाहरी सुशोभन और आलंबन से उसके दिमागी हालात पता नहीं लगा सकते । जैसे शूपर्णखां, मरीचि, पूतना और रावण के परिधान अच्छे थे लेकिन मन गंदा ।

5.तुलसी जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोई ।

तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोई ।

Tulsidas  कहते हैं कि दूसरों की निंदा करके खुद की पीठ थपथपाने वाले लोग मतिहीन है । ऐसे मूढ़ लोगों के मुख पर एक दिन ऐसी कालिख लगेगी जो मरने तक साथ नहीं छोड़ेगी ।

तुलसीदास के दोहे सार के साथ हिंदी में

6.तनु गुण धन धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान ।

तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहू गत जान ।

Tulsidas  कहते हैं कि सुंदरता, अच्छे गुण, संपत्ति, शोहरत और धर्म के बिना भी जिन लोगों में अहंकार है । 

ऐसे लोगों का जीवनकाल कष्टप्रद होता है जिसका अंत दुखदाई ही होता है ।

7.सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु ।

बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु ।

बहादुर व्यक्ति अपनी वीरता युद्ध के मैदान में शत्रु के सामने युद्ध लड़कर दिखाते है और कायर व्यक्ति लड़कर नहीं बल्कि अपनी बातों से ही वीरता दिखाते है ।

8.सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ।

सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ।

अपने हितकारी स्वामी और गुरु की नसीहत ठुकरा कर जो इनकी सीख से वंचित रहता है,

वह अपने दिल में ग्लानि से भर जाता है और उसे अपने हित का नुकसान भुगतना ही पड़ता है ।

Tulsidas Ke Dohe in Hindi 

9.राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार ।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ।

अगर मनुष्य अपने भीतर और अपने बाहर जीवन में उजाला चाहता है तो Tulsidas  कहते हैं कि उसे अपने मुखरूपी प्रवेशद्वार की जिह्वारूपी चौखट पर राम नाम की मणि रखनी चाहिए ।

10.मुखिया मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।

पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ।

Tulsidas  जी कहते हैं कि अधिनायक मुख जैसा होना चाहिए, जो खान-पान में तो इकलौता होता है

लेकिन समझदारी से शरीर के सभी अंगों का बिना भेदभाव समान लालन-पालन करता है ।

Top 5 Tulsidas poem

  1. मैं केहि कहौ बिपति अति भारी

मैं केहि कहौ बिपति अति भारी। श्रीरघुबीर धीर हितकारी

मम ह्रदय भवन प्रभु तोरा। तहँ बसे आइ बहु चोरा

अति कठिन करहिं बर जोरा। मानहिं नहिं बिनय निहोरा

तम, मोह, लोभ अहंकारा। मद, क्रोध, बोध रिपु मारा

अति करहिं उपद्रव नाथा। मरदहिं मोहि जानि अनाथा

 

  1. लाज न आवत दास कहावत

लाज न आवत दास कहावत।

सो आचरन-बिसारि सोच तजि जो हरि तुम कहं भावत

सकल संग तजि भजत जाहि मुनि, जप तप जाग बनावत

मो सम मंद महाखल पाँवर, कौन जतन तेहि पावत

हरि निरमल, मल ग्रसित ह्रदय, असंजस मोहि जनावत

जेहि सर काक बंक बक-सूकर, क्यों मराल तहँ आवत

जाकी सरन जाइ कोबिद, दारुन त्रयताप बुझावत

तहूँ गये मद मोह लोभ अति, सरगहुँ मिटत न सावत

भव-सरिता कहँ नाउ संत यह कहि औरनि समुझावत

हौं तिनसों हरि परम बैर करि तुमसों भलो मनावत

नाहिन और ठौर मो कहॅं, तातें हठि नातो लावत

राखु सरन उदार-चूड़ामनि, तुलसिदास गुन गावत

Rammilan

तुलसीदास की कविताएँ 

3.जो मोहि राम लागते मीठे

जो मोहि राम लागते मीठे

तौ नवरस, षटरस-रस अनरस ह्वै जाते सब सीठे

बंचक बिषय बिबिध तनु धरि अनुभवे, सुने अरु डीठे

यह जानत हौं ह्रदय आपने सपने न अघाइ उबीठे

Tulsidas  प्रभु सो एकहिं बल बचन कहत अति ढीठे

नामकी लाज राम करुनाकर केहि न दिये कर चीठे

4.अब लौं नसानी अब न नसैहों

अब लौं नसानी अब न नसैहों।

रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं

पायो नाम चारु चिंतामनि उर करतें न खसैहौं

स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं

परबस जानि हस्यो इन इंद्रिन निज बस ह्वै न हसैहौं

मन मधुपहिं प्रन करि, तुलसी रघुपति पदकमल बसैहौं

Best Five Avdhi Poems Of Tulsi das 

5.मन माधवको नेकु निहारहि

मन माधवको नेकु निहारहि

सुनु सथ, सदा रंककेधन ज्यों, छिन-छिन प्रभुहिं सभारहि

सोभा-सील ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर, परम उदारहि

रंजन संत,अखिल अघ गंजन, भंजन बिषय बिकारहि

जो बिनु जोग, जग्य, ब्रत, संयम गयो चहै भव पारहि

तौ जनि Tulsidas  निसि बासर हरि-पद कमल बिसारहि

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *