Shri krishna ne gopiyon ke vastra kyon churaye?

जब तक मनुष्य शरीर इस माया के बंधन में बंधा हुआ रहता है, तब तक वह श्री कृष्णा को प्राप्त नहीं कर सकता।

लेश मात्रा भी मायाबद्ध रहने से श्री कृष्ण के साथ गोलोक धाम या मनुष्य धाम में प्रवेश होना असंभव है.

इसिलिए श्रीकृष्ण ने हर एक Gopi के वस्त्र चुराए थे।

उनमे शर्म नाम की यह माया अभी तक बची हुई थी,

वह इन से मुक्त नहीं हुई थी उनको वह तत्व प्रेम देने के लिए ही श्री कृष्ण ने वस्त्र चुराए थे।

Why did Lord Krishna steal garments of unmarried Gopi girls?

श्री कृष्णा ने गोपियों के वस्त्र का हरण किये थे। परन्तु आज यहाँ पर इस रहस्य को उद्घाटित करना बहुत ही अनिवार्य है की.

भगवान् श्री कृष्ण ने ऐसा क्यों किया?

श्री कृष्ण पूर्ण पुरुष परमेश्वर भगवान् इस धरती पर जीवों को असली प्रेम तत्व समझाने और

धरती से पापियों का नाश करने हेतु अवतरित हुए थे।
मनुष्य का शरीर 24 तत्वों से मिलकर बना होता है। जो माया के अंतर्गत आती हैं,

माया के अन्तर्गत जब तक लेश मात्र भी पड़े रहने तक ईश्वर पर प्रेम होना असंभव है, ईश्वर दर्शन होना असंभव मात्र है।

गोपी एक प्रेम की उच्च अवस्था है; गोपी की बुद्धि, उसका मन, चित्त, अहंकार.

और उसकी सारी इन्द्रियां उनके प्रियतम श्याम सुन्दर के सुख के साधन हैं।

उनका जागना-सोना, खाना-पीना, चलना-फिरना, श्रृंगार करना, गीत गाना, बातचीत करना–सब श्रीकृष्ण को सुख पहुँचाने के लिए है।

Gopi का श्रृंगार करना भी भक्ति है। यदि परमात्मा को प्रसन्न करने के विचार से श्रृंगार किया जाए तो वह भी भक्ति है।

मीराबाई सुन्दर श्रृंगार करके गोपालजी के सम्मुख कीर्तन करती थीं।

उनका भाव था–’गोपालजी की नजर मुझ पर पड़ने वाली है। इसलिए मैं श्रृंगार करती हूँ।’

Who and what is gopi?

गोपी को अगर हम सामन्य रूप से समझे तो गोपी शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गयी है–’गो’ अर्थात् इन्द्रियां और ‘पी’ का अर्थ है पान करना।
गोपी वही है जो भक्ति रस का पान समस्त इन्द्रियों से करे।

‘गोभि: इन्द्रियै: भक्तिरसं पिबति इति गोपी।’

अर्थात जो अपनी समस्त इन्द्रियों के द्वारा केवल भक्तिरस का ही पान करे, वही गोपी है। गोपी भक्ति की पराकाष्ठा का नाम है।

गोपी कहना बहुत ही सरल है, परन्तु गोपी होना बहुत ही कठिन।

Gopi

Gopi kon hain?

दूसरे शब्दों में अगर देखा जाए तो Gopi वह जो जीती हैं तो केवल श्री कृष्ण के लिए, उनके सारे कर्म भी कृष्ण के लिए ही हैं,

अर्थात केवल श्रीकृष्ण की सुखेच्छा। जिसका जीवन इस प्रकार का है, वही गोपी है।

गोपियों की प्रत्येक इन्द्रियां श्रीकृष्ण को अर्पित हैं। गोपियों के मन, प्राण–सब कुछ श्रीकृष्ण के लिए हैं।

उनका जीवन केवल श्रीकृष्ण-सुख के लिए है। सम्पूर्ण कामनाओं से रहित उन गोपियों को श्रीकृष्ण को सुखी देखकर अपार सुख होता है।

उनके मन में अपने सुख के लिए कल्पना भी नहीं होती। श्रीकृष्ण को सुखी देखकर ही वे दिन-रात सुख-समुद्र में डूबी रहती हैं।

Sankhya darshan ke 25 tatv kon se hain?

सांख्य दर्शन के 25 तत्व
आत्मा(पुरुष)
(अंत:करण 4) -मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार
(ज्ञानेन्द्रियाँ 5) -नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण
(कर्मेन्द्रियाँ 5) -पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक्
(तन्मात्रायें 5) -गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द
(महाभूत 5) -पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश

Shri krishna ki aayu kitni thi jab gopiyon ke vastra unhone churaye the?

श्री कृष्ण मात्र 6 वर्ष के थे, जब उन्होंने गोपियों के वस्त्र चुराए थे।

आप ही अब स्वयं सोच सकते हैं की इतनी छोटी आयु में वस्त्र हरण करना एक भौतिक दृष्टि से क्रीड़ा हो सकती है, परन्तु अभद्रता नहीं।

वो साक्षात् परमेश्वर है, राजाधिराज ईश्वरो के इश्वर, अंतिम सत्य हैं। उन्होंने गोपियों के वस्त्र उन्ही के कल्याण के लिए चुराए थे।

How can we accept Lord Krishna as God, despite his actions of flirting with the Gopis (village maidens)?

श्री कृष्ण का हास परिहास गोपियों के प्रति प्रेम भाव को प्रगट करना है।

क्या? एक 6 वर्ष का बालक  किसी कन्या के साथ मधुर भाव का विवेचन कर सकता है, श्री कृष्ण परम परमेशवर हैं.

और Gopi का रोम-रोम श्री कृष्णा से देदीव्यमान हैं। उनके हर सांस में श्री कृष्ण चेतन अवस्था में विराजित हैं।
यहाँ पर यह स्पष्ट करना बहुत ही अनवार्य है की गोपियों के साथ प्रेम शारीरिक नहीं आत्मिक प्रेम था।

गोपिओं का प्रेम, प्रेम की महापराकाष्ठा है।

जिसे ब्रह्मा विष्णु महेश भी आसानी से बिना गोपी देह प्राप्त किये नहीं जान सकते।

उन्हें भी महारास में प्रवेश करने हेतु गोपी देह प्राप्त करना अनिवार्य हो जाता है।

Gopi

Are gopikas Krishna’s girlfriends?

महारास में भी यही हुआ था, कोई भी गोपी सशरीर रास लीला में सम्मिलित नहीं हुई थी, बल्कि सूक्ष्म रूप से उन्होंने महारास में भाग लिया था, उनका प्रेम इतना प्रगाढ़ हो गया था की वह प्रेम की महारास में चली गई।

जो एक साधक की सर्वोत्तम अवस्था है और यही अंतिम चरमभूमि है।

जहाँ पर भक्त जाना चाहता है और उस आनंदरस को प्राप्त करना चाहता है। जो न जाने कितने कल्पो से उसके लिए भटक रहा था।

अतः यहाँ पर श्री कृष्ण के प्रेम को भौतिकता न देते हुए आत्मिक दृष्टि या प्रेम रुपी दृष्टि से देखें.

तो वह गोपियों की कृष्णा के प्रति प्रेम की महापाराकष्ठा है। जो प्रेम की एक सर्वोत्तम अवस्था है।
श्री कृष्णा इस मर्त्य लोक में अवतरित हुए प्रेम तत्व को समझाने तथा इस धरती से पाप का नाश करने हेतु.

और अपने मनुष्यो को इस काल रुपी संसार से बचाने हेतु।

How do I make myself feel like I’m serving Krishna?

जो कुछ भी कर रहे हैं यही सोच के करो की श्री कृष्ण के लिए ही कर रहे हैं।

आपका चलना, खाना-पीना, श्वास तक लेना यही सोच के होगा की आप श्री कृष्ण के लिए कर रहे हैं।

यह आत्मा, परमात्मा का अभिन्न अंग है। जिससे हम पृथक हो गए हैं।

आपका जो भी कर्म है, उसका बिना कोई फल लेते हुए निष्काम भक्ति से कर्म करना यही आपको धीरे-धीरे श्री कृष्ण प्रेम की और अग्रसरित करेगा।

यहाँ पर इस बात को स्पष्ट करना अनिवार्य है की जब साधक इस अवस्था तक पहुचता है.

तब उसे इस बात का भी भान नहीं रहता की वह श्री कृष्णा की सेवा कर रहा है।

ऐसा इसलिए क्योंकि इस अवस्था में साधक का चित्त कृष्ण तन्मयता में इतना विलीन हो जाता है की वो खुद ही को कृष्ण ब्रज की गोपी ब्रज रेणु ये सब समझने लगता है।

जहाँ आत्मा कृष्ण के लिए श्वास कृष्णा के लिए, सारे क्रियाकलाप कृष्णा के लिए, कृष्ण को छोड़ और कुछ है ही नहीं।

What is the importance of Gopi Geet?

Gopi Geet भगवान् श्री कृष्णा को प्राप्त करने का मंत्र है।

श्रीमद्भभागवत महापुराण में 10 वे स्कन्द के अंतर्गत गोपीया जब महारास में श्री कृष्ण से बिछड़ गयीं थी, तब उन्होंने यह गीत गाया।

महारास के दौरान जब गोपियाँ कृष्ण के साथ महारास कर रही थी.

तब गोपियों को अभिमान हो गया था की उनसे बड़ा महाभागी और कोई है ही नहीं,जिसके साथ त्रिलोकपति परमपुरुष भगवान् रास कर रहे हैं।

जैसे ही यह भाव उनके मन में आया श्री कृष्ण अंतर्धान हो गए। उनको पुनः प्राप्त करने के लिए ही गोपियों ने गीत गाया।

Gopi

Gopiyon ne gopi geet kyon gaya?

यहाँ पर एक बात ध्यान देने वाली है, जब भी भक्ति साधन में प्रेम के परिपक्वता की बात आती है.

तो वहाँ Gopi को ही सर्वश्रेठ बताया जाता है। ऐसा प्रेम, ऐसा त्याग कहीं और नहीं देखने को मिलेगा।

गोपियों का प्रेम, साधक के भक्ति की महापाराकष्ठा होती है।

जहाँ भक्त गोपी देह प्राप्त करके महारास में सम्मिलित होता है।

यहाँ पर एक और तथ्य को उजागर करना अनिवार्य है की यह सारी अवस्थाएँ जो यहाँ पर बतायीं जा रही हैं बहुत ही उच्च स्तर की बात है।

जब साधक अपना स्वभाव प्राप्त कर लेता है, उसके बाद ही असली साधना शुरू होती है।

यह भी एक उच्च अवस्था की बातें हैं हमारे लिए बस श्री कृष्ण के प्रति निष्कामता ही प्रथम सीढ़ी है।

Gopi geet prem virah geet kyon kaha jaata hai?

गोपी गीत कृष्ण प्राप्ति का महामंत्र है। जिसे गोपियों द्वारा गाया गया था यह प्रेम के उच्च लक्षणों को प्रकट करता है, जिससे कृष्ण के प्रति प्रीती होती है और कृष्ण तत्त्व की प्राप्ति होती है। कृष्ण जब अंतर्धान हो गए थे, तब गोपियों ने यह विरह गीत गया जिससे कृष्ण दोबारा उन्हें प्राप्त हो जाएँ।

What is the importance of the verse 16 in Gopi Gita, the song of Gopis in the journey of life?

Gopi Geet एक उच्च आध्यात्मिक स्तर का विषय है यहाँ इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा हास परिहास का विषय बन सकता है क्योँकि यह विषय बहुत ही गूढ़ है। बिना किसी आध्यात्मिक ज्ञान या अनुभव को इन सब तत्वों का उदघाटन करना परिहास ही मात्रा होगा। दूसरी ओर इस प्रेम को लेखनी या विचारों द्वारा प्रकट करना भी असंभव है।

श्री कृष्ण और गोपी का प्रेम वाणी से व्यक्त करना असंभव है। यह प्रेम की पराकाष्ठा का एक सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। गोपी गीत गोपियों ने कृष्णा को पुनः प्राप्त करने के लिए गाया था।

Gopi Geet

गोपी साधक की सर्वोच्च अवस्था है उस अवस्था पर पहुँचना सर्वसाधारन के लिए असंभव है। बिना इस माया के पार जाए ज्ञान से विज्ञान में स्थित हुए बिना इस प्रेम को समझना और समझाना ही असंभव है क्योंकि यहरस अनुभव का है, प्रयोग का नहीं।

Gopi

 

Who is the real Ahladini Shakti of Sriman Narayana Hari Vishnu? Is it Radha, Lakshmi, or Durga?

कृष्ण भगवान की आंतरिक शक्ति, जिसे अह्लादिनी शक्ति कहा जाता है, श्रीमती राधा रानी है।

विष्णु भगवान् के लिए यह श्री, भू और नीला के रूप में लक्ष्मी देवी है, राम के लिए यह सीता देवी है,

कल्कि के लिए पद्म देवी, वराहा के लिए यह वाराही देवी है।

अंततः अगर हम आध्यात्मिक गूढ़ता की ओर चले तो अंत में हम श्री कृष्ण और माँ राधा को ही पाएंगे।

जहाँ श्री माँ राधा ही अह्लादिनी शक्ति है।

Why is Lord Krishna linked to so many “Gopies”?

श्री कृष्ण और Gopi का प्रेम आत्मा से परमात्मा का प्रेम है। यह एक दिव्य प्रेम है,

जिसे हम मनुष्य न तो व्यक्त ही कर सकते न उसे समझ ही पाएंगे।

योगियों का करोडो वर्षो का तप धरा का धरा रह जाता है, तब भी वह इस प्रेम तत्त्व को नहीं समझ पाते।

हम कुछ मामूली सी पुस्तकों के ज्ञान से तर्क वितर्क और उस पे चर्चा छेड देते हैं।

हाँ ऐसा नहीं है हम कभी उस तत्त्व को नहीं समझ पाएंगे, समझेंगे क्यों नहीं हम तो उसी परमात्मा का अंश आत्मा रूप में विभाजित हैं।

परन्तु उसमे साधक का परिश्रम ईश्वर के प्रति उसकी पिपासा उसका प्रेम, उसे उस तत्व को समझने के लिए बाध्य कर देगा ।

What was his charm if he was not the supreme power?

श्री कृष्णा एक परम तत्व हैं जिन्हें करोड़ों में से लाख जानने के लिए परिश्रम करते हैं,

उनमे से भी हजार उस परिश्रम के फल हेतु आगे बढ़ते हैं और उन हजारों में से कुछ ही उस तत्व को प्राप्त कर पाते हैं।

अब यदि यहाँ पे हम कृष्णको साधारण मनुष्य के रूप में देखते हैं तब तो ये सारी लीलाएं भी नहीं होंगी,

न गोपी होंगी न राधा होंगी, बस साधरण से मनुष्य मात्र की भाति ही आचार विचार उनके भी होंगे।

Krsihna ki gopi banne ke lie arjun ne kyon dharan kiya tha stree ka roop?

एक समय की बात है जब अर्जुन कृष्ण के रास का रहस्य जानना चाहते थे।

अर्जुन ने अपने सखा से कहा कि वे उन्हें बताएं कि उनकी कितनी गोपियां हैं?

वह किस-किस श्रेणी में आती हैं? उनके नाम क्या हैं? वो करती क्या हैं? उनकी उम्र क्या है?

और कृष्ण उनके साथ रास रचाने जाते कहा हैं?
श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि कोई भी पुरुष कभी उस स्थान के बारे में नहीं जान सकता जहां वे और उनकी गोपियां जाती हैं।

इतना ही नहीं श्री कृष्ण का कहना था कि कोई भी पुरुष उन्हें कितना ही प्रिय क्यों ना हो लेकिन वह कभी रास के रहस्य तक नहीं पहुंच सकता।

कृष्ण ने कहा कि स्वयं ब्रह्मा भी गोपियों को नहीं देख सकते। इसलिए कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि वे अपनी उत्सुकता को त्याग दें।

Kumbh Mela

यह तो सत्य ही है की इस बार कुम्भ में Gopi and Krishna with Radha जी अवश्य ही स्नान हेतु आएंगे. कुम्भ हेतु ज्यादा जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

KumbhMela jayen
KumbhMela jayen

Why did Arjun take the form of a woman to become Krishna’s gopi?

वास्तव में दरअसल अर्जुन कृष्ण के रास का रहस्य जानना चाहते थे।

अर्जुन ने अपने कृष्ण से कहा कि वे उन्हें बताएं कि उनकी कितनी गोपियां हैं?

वह किस-किस श्रेणी में आती हैं उनके नाम क्या हैं वो करती क्या हैं उनकी उम्र क्या है और कृष्ण उनके साथ रास रचाने जाते कहा हैं?

इन सभी उत्सुकता को मिटाने के लिए अर्जुन ने श्री कृष्णा से जिद्द की थी ।

अंततः भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अर्जुनी बनाया, जो की गोलोक धाम में प्रवेश करने के लिए जरूरी है।

Gopi देह धारण करने के बाद ही महारास में प्रवेश हो सकता है। यह बहुत ही गोपनीय और उच्चतम आध्यात्मिक स्तर है।

जहाँ एक साधक आध्यात्म की महापारकस्था को लांघ कर परमात्मा में स्थित हो जाता है और परमानन्द में लीन हो जाता है।

Gopi

Uddhav aur gopi samvaad kya hai?

उधो और गोपी संवाद श्रीमद महाभागवत पुराण का सबसे महत्वपूर्ण और रसिक विषय है।

जहाँ उधो का ज्ञान और गोपियों की भक्ति का उच्चतम भाव प्रस्तुत किया गया है।

जब गोपियों को यह ज्ञात हुआ कि उद्धव श्री कृष्ण का संदेश लेकर आये हैं, तब उन्होंने एकान्त में मिलने पर उनसे श्री कृष्ण का समाचार पूछा। उद्धव ने कहा, गोपियों! श्री कृष्ण ज्ञानियों के ज्ञान हैं, भगवान श्रीकृष्ण सर्वव्यापी हैं।

वे तुम्हारे हृदय तथा समस्त जड़-चेतन में व्याप्त हैं। उनसे तुम्हारा वियोग कभी हो ही नहीं सकता।

उनमें भगवद बुद्धि के द्वारा ही आप सभी श्री कृष्ण भगवान् का साक्षात्कार कर सकते हैं।

What is uddhav and gopi samvad?

गोपियों ने कहा- “उद्धवजी! हम जानती हैं कि संसार में किसी की आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है,

फिर भी हम श्रीकृष्ण के लौटने की आशा छोड़ने में असमर्थ हैं।

उनके शुभागमन की आशा ही तो हमारा जीवन है।

यहाँ का एक-एक प्रदेश, एक-एक धूलिकण श्यामसुन्दर के चरण चिह्नों से चिह्नित है।

हम किसी प्रकार मरकर भी उन्हें नहीं भूल सकती हैं।”

Gopiyon ka Krishna ke prati prem ki parakashtah ka kya swaroop hai?

गोपियों के अलौकिक प्रेम को देखकर उद्धव के ज्ञान अहंकार का नाश हो गया।

वे कहने लगे- “मैं तो इन गोप कुमारियों की चरण रज की वन्दना करता हूँ।

इनके द्वारा गायी गयी श्रीहरि कथा तीनों लोकों को पवित्र करती है।

पृथ्वी पर जन्म लेना तो इन गोपांगनाओं का ही सार्थक है।

मेरी तो प्रबल इच्छा है कि मैं इस ब्रज में कोई वृक्ष, लता अथवा तृण बन जाऊँ, जिससे इन गोपियों की पदधूलि मुझे पवित्र करती रहे।”

Gopi

What is Essence of Gopi-prem?

Gopi की कृष्णभक्ति से उद्धव इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गोपियों की चरण रज की वन्दना की.

तथा इच्छा प्रकट की कि- “मैं अगले जन्म में गोपियों की चरण रज से पवित्र वृन्दावन की लता, औषध, झाड़ी आदि बनूँ।”

इस प्रकार कृष्ण के प्रति ब्रजवासियों के प्रेम की सराहना करते हुए तथा नन्दादि, गोप तथा गोपियों से कृष्ण के लिए अनेक भेंट लेकर वे मथुरा लौट आये।

Shivji ne gopi ka ropp kyon rakha?

एक बार जब शरद पूर्णिमा की उज्जवल चांदनी में वृन्दावन में यमुना किनारे वंशीवट पर भगवान श्रीकृष्ण की वंशी बजी.

भगवान श्रीकृष्ण ने छ: माह की एक रात्रि करके असंख्य गोपियों के साथ महारास किया।

मनमोहन की मीठी मुरली की तान ने कैलास पर्वत पर विराजित शंकरजी का मन मोह लिया.

और उनका ध्यानभंग हो गया। वे बावले से हो गए.

और भगवान राधाकृष्ण और उनकी गोपियों की दिव्य रासलीलाओं को देखने के लिए कैलास छोड़कर चल दिए वृन्दावन की ओर।

Gopi prem ka sar kya hai?

गोलोक में बिना Gopi देह के तो प्रवेश होना ही असंभव है.

तभी भगवान शंकर ने गोपियों से कहा– हमें महारास व श्रीराधाकृष्ण के दर्शन की लालसा है,

अत: आप ही कोई उपाय बतलाओ जिससे हम महारास के दर्शन कर सकें?

तब ललिता सखी ने कहा–यदि आप महारास देखना चाहते हो तो गोपी का देह धारण करना अनिवार्य है।

Gopeshwar nath

मानसरोवर में स्नानकर गोपीरुप धारण करके ही महारास में प्रवेश हो सकता है।

भगवान शंकर यह सुनते ही अर्धनारीश्वर से पूरे नारीरूप बन गए।
और यमुना ने उनका गोपियों की तरह पूर्ण सोलह श्रृंगार किया.

अंततः भोलेनाथ से गोपी बनकर मतवाली चाल चलते हुए शंकरजी महारास में प्रवेश कर गए।

कोटि-कोटि कामिनि, दामिनि घन संग सुसोभन साजै।
मन्मथ-मन्मथ मुरलि-मनोहर द्वै द्वै के बिच राजै।।