chaar dham-चारधाम यात्रा के बारे मे जानें सबकुछ Leave a comment

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भारत के चारधाम(chaar dham) धर्मग्रंथो के अनुसार उत्तर मे बद्रीनाथ(उत्तराखंड) पश्चिम मे द्वारिका (गुजरात) पूर्व मे पूरी (उड़ीसा) य सबसे आखिरी दक्षिण मे (रामेश्वरम) स्थित है , भगवन शिव को समर्पित है|


char dham yatra

पश्चिम व् पूर्व धाम भगवान श्री कृष्णा को समर्पित है जो की विष्णु के अवतार थे. हमारा तीसरा धाम बद्रीनाथ जो की उतर दिशा मे है खंड मे स्थित है. यह धाम भगवान विष्णु को समर्पित है. हमारा चौथा धाम (रामेश्वरम )दक्षिण दिशा मे तमिलनाडु मे स्थित है यह शिव भगवान को समर्पित है|


बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिरो के गरब ग्रहो मे किस- किस देवताओ की पूजा होती है|भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा होती है| बद्रीनाथ और केदारनाथ उत्तराखंड के दो प्रमुख तीर्थ स्थल है. बद्रीनाथ चार धामों मे से एक धाम है. जहा भगवान विष्णु की पूजा होती है. जबकि केदारनाथ सिर्फ एक ऐसा तीर्थ स्थल है जहा पर केवल भगवान शिव की पूजा होती है.


Kon sa dham purvi dham kahlata hai?
Purri dham jo ki udisa mai sthith hai,purvi dham kahlata hai.

Hinduoo ke char thirth jinhe dham kaha jata hai ,kon se hai?
Badrinath(uttrakhand) , dwarika(gujrat) ,puri(udisha),rameshwaram(tamilnadu).

हम जानते है बद्रीनाथ धाम के इतिहास के बारे मे.भारत के उत्तर मे बर्फ से ढकी पर्वत शखलायो की गोद मे बसा पवित्र धाम बद्रीनाथ समस्त हिन्दू जाती के लिए पवित्र एवं पूज्यनीय स्थान है.

Badrinath dham kaha avsthith hai?
Badrinath dham uttrakhand mai sthith hai jo ki bagvan Vishnu ki samarpit hai.

char dham yatra details in hindi

हिन्दू शास्त्र के अनुशार बद्रीनाथ की यात्रा के बिना साडी यात्राएं अधूरी है. अब से कुछ समय पहले यह की यात्रा अभूत कठिन थी लेकिन. अब सड़क बन जाने के यह पहुंचने मे बहुत सुविधा हो गयी है.वाहनों द्वारा यह सुगमता से पंहुचा जा सकता है. धर्म आस्था और विश्वास के कारण यह लगातार भक्तो की भीड़ लगी होती है. बद्रीनाथ केवल धर्म सैलानियों के लिए नहीं बल्कि सैलानियों एवं प्रकति प्रेमियों के लिए भी है.

Badrinath dham kis devta ko samrapit hai?
Yah dham bagvan Vishnu ko samrapit hai.

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बद्रीनाथ एक मनोरम स्थल है.हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र मे समुद्र तल से लगभग 30122 मीटर की उचाई पर लक्ष्मण गंगा और अलकनंदा के समीप यह पुण्य भूमि स्थित है| कभी यहाँ बेर की झाडिया थी इसीलिए इसको बदरीवन भी कहा जाता रहा है. यहाँ गरम ठन्डे पानी के स्त्रोत भी है. जगतगुरु शंकाराचार्य के समय से इसको बद्रीनाथ कहा जाता रहा है. व्यास मुनि का जन्म भी बदरीवन मे हुआ| यही उनका आश्रम भी था.इसीलिए वेद व्यास को बेदरायण भी कहा जाता है. इसी आधार पर इस मुख्या मंदिर का नाम भी बद्रीनाथ पड़ा| भारतीय संतो अवं महात्माओ ने उत्तराखंड की इस धरती को देवताओ और प्रकति का मिलान स्थान मन गया है. आदि युग मे नर और नारायण ने त्रेता युग मे भगवन राम ने द्वार पर युग मे वेद व्यास ने तथा शंकरचार्य ने बद्रीनाथ मे आस्था और भक्ति के सूत्रदार रहे है.

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बोध्य धर्म के बाद चीन ने भारत पर आक्रमण किया और मंदिर को तहश नहश कर डाला. वह स्थापित विष्णु मूर्ति को नारद कुंड मे डाल दिया. शंकरचार्य जी ने हिन्दू धर्म के पुनः स्थापना के लिए .उस प्रतिमा को उस कुंड से निकल कर गरुण गुफा मे स्थापित किया.चंद्रवंशी गढ़वाल नरेश ने यह मंदिर निर्माण करवाया.उस मंदिर पर इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने सोने का मुकत चढ़वाया.


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इस तरह से भक्ति भावात्मक आधार का केंद्र बना जगनाथ पूरी ओडिशा के ताम्बे का कड़ा बद्रीनाथ मे चढ़ाये बिना भारत की तीर्थ यात्रा पूरी नहीं होती है. बद्रिका आश्रम मे वास करने वाले विष्णु रूप हो जाते है.ऐसी मान्यता है यह लक्समी जी खुद भोजन पकती है.और नारायण जी परोसते है. अतः सभी धरम जाती और संप्रदाय के लोग साथ मे बैठकर प्रसाद ग्रहण करते है. यात्रा और धार्मिक दृस्टि से बद्रीनाथ का विशेष महत्व इसलिए भी है क्यों की ये भारत का सबसे प्राचीन क्षेत्र है.
इसकी स्थापना सतयुग मे हुए .यहाँ प्राकतिक दिव्यता के साथ आध्यात्मिक शांति भी मिलती है.यह पूजा अर्चना करके मानव पुन्हः जन्म के बंधनो से मुक्त हो जाता है. बद्रीनाथ मे नर और नारायण नाम के दो पर्वत शिखर है. इनके बीच पथरी स्थल पर यहाँ का मुख्य मंदिर स्थित है.

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जगन्नाथ पुरी ओडिसा राज्य मे. बंगाल की खाड़ी के किनारे बसी है यह स्थल जगन्नाथ पुरी प्राचीन कलिंग की राजधानी रह चुकी है. धरम शास्त्रों मई इसको जगन्नाथ पुरी के अलावा संक्षेत्र कहा गया है .भारत के चार धामों यह भी एक धाम है. ऐसे मान्यता है की यह कलयुग का एक धाम है. शंकराचार्य के द्वारा देश मे स्थापित चारो दिशाओ मे से एक मठ पुरी मे भी है. जो की गोवर्धन पीठ के नाम से प्रसिद्ध है. पुरी मे एकादशी व्रत मे किसी ने श्री बल्भाचार्य महाप्रभु की निष्ठा परीक्षा ली. महाप्रभु ने प्रसाद हाथ मे लिए ही द्वादशी शुरू होने तक जगन्नाथ जी का इस्तवन करके महाप्रसाद तथा एकादशी को समुचित मान लिया।शिखो के प्रथम गुरु नानकदेव जी यह पधारे थे। जिनका स्थान नानकमठ जगन्नाथ मंदिर के सामने है।

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भक्त एवं कवी सुर ने भी श्री जगन्नाथ के दर्शन किये थे।चैतन्य महाप्रभु यह लम्बे समय तक रहकर यहाँ महा सड़ना करते रहे है। जगन्नाथ रथ यात्रा छुआ-छूत निवारण के भावना के कारन भी विशेष महत्त्व है| चैतन्य महा प्रभु ने जगन नाथ का महा भोग लेते वक्त यह जाती का विचार नहीं किया था। मनो का पूरी पहुंचते ही भाग्य उदय होना शुरू हो जाता है। मंदिर स्थित कल्प व्रश्च िश्चयो की पूर्ति करता है। त्रिमूर्ति प्रभु के दर्शन से असीम आनंद प्राप्त होता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। जिसे हर कार्य सिद्ध होता है। जगन्नाथ पूरी के धार्मिक प्रस्थ भूमि के बारे मे कहा जाता है की इसे कलयुग का पवन धाम माना जाता है|

भारतवर्ष न जाने कितनी सालो का साक्षी रहा है। इसके जान जान के हृदय मे समाये अनेको धर्म स्थल नदिया और पर्वत उन्ही मे से देवालय कहे जाने वाले पर्वत राज हिमालय कई कालो से अपनी छठा बिखेर रहा है।हिमालय की वादियों मे कई देव स्थल स्थित है।

शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥

यह अनादि क्षेत्र है .कभी इस क्षेत्र को मुक्तिप्रदा योगसिध्दाता. इस प्रकार से अलग युगो मे इस क्षेत्र को जाना गया .मुक्तिप्रदा इस क्षेत्र को इसीलिए बोलते थे क्योकि सतयुग मे भगवान के प्रत्यक्ष दर्शन हुए. तेत्रायुग आने तक लोगो को योग साधना करनी पड़ती थी.योग साधना के बाद भगवान का साक्षात्कार होता था.
नरसिंघ जयंती के कारण बैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चुतर्थी तिथि को मनाया जाता है| पुराणों मे वरन कथाओ के अनुसार इसी पवन दिवस को भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंघ अवतार लिया था| जिसके कारन यह दिन बड़े ही हर्षोउल्लाह से उनकी जयंती के रूप मे मानते है.

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