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badrinath temple history in hindi

चार धाम हिन्दू तीर्थ स्थानों मे सबसे महत्वपूर्ण बद्रीनाथ(badrinath dham history in hindi) है।यह भारत के उत्तराखंड राज्य मे स्थित है।यह उत्तर भारत मे धर्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है।चार धाम की यात्रा पवित्र यमुनोत्री से आरम्भ होती है।यह गंगोत्री और केदारनाथ होते हुए।यह चार धामों मे एक महत्वपूर्ण धाम बद्रीनाथ मे समाप्त होती है।भारत के उत्तरखंड राज्य के चमोली जिले मे स्थित बद्रीनाथ भगवान विष्णु का निवास स्थान है।


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ऐसा कहा जाता है की बद्रीनाथ(badrinath dham history in hindi) क्षेत्र मे बद्री के जंगल थे इसीलिए इस क्षेत्र मे स्थित विष्णु के मंदिर को बद्रीनाथ का नाम दिया गया है।ये कहा जाता है एक बार जब भगवान विष्णु किसी संकट से निकलने के लिए गंभीर तपस्या कर रहे थे।उनकी पत्नी लक्ष्मी ने नीरव जलवाऊ और मौसम को जलजीवन देते हुए अपने पति छाया और पोषण देने के लिए देववृक्ष का रूप धारण कर लिया।बद्रीनाथ मंदिर भगवन विष्णु को समर्पित है।भगवान विष्णु जग के पालनकर्ता है।वे हिन्दू धर्म के त्रिमूर्ति अर्थात सर्जन ,पालन और संहार करनेवाले ब्रह्मा ,विष्णु ,और महेश मे से एक है।लोककथाओ के अनुसार उनके बारे मे प्रचलित दन्तकथाओं से भी प्रचलित है।मंदिर के दैविक युग के शुरू होने से पहले का प्रमाण दिया जाता है।हिन्दुओ के आदरणीय अदि संत गुरु शंकरचार्य ने 8वी शताब्दी मे पुनः एक महत्वपूर्ण स्थान के रूप मे करी।


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ऐसा कहा जाता है खुद भगवान विष्णु गुरु शंकराचार्य के सपने मे आए और अलकनंदा नदी से उनकी मूर्ति को दोबारा स्थापित करने को कहा गया था।अगले दिन गुरु शंकरचार्य की मूर्ति को अलंकनंदा को निकाला। जिन्होंने बाद मे तप्त कुंड के निकट गुफा मे स्थापित कर दिया। तत पश्चात 16वी शांताब्दी मे गढ़वाल के राजा ने मूर्ति को वर्तमान मंदिर मे स्थापित किया।

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हिन्दू धर्म के चार धामों मे सबसे महत्वपूर्ण बद्रीनाथ(badrinath dham history in hindi) है।इसके साथ ही हिन्दू धर्म के वैष्णो संप्रदाय के लोगो के लिए 108 पवित्र स्थानों मे से एक है।बद्रीनाथ मंदिर नर और नारायण पर्वत के बीच घाटी मे बड़ी कुशलता से स्थित है।जिसके आगे अलकनन्दा नदी बहती है। बद्रीनाथ समुद्र ताल से 30123 मीटर की उचाई पर स्थित है।जिसके पीछे नीलकंठ पर्वत है।
यह ऋषिकेश के उत्तर 301 किलोमीटर की दूरी और केदारनाथ के नजदीक गौरी कुंड।यह सड़क मार्ग से 233 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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विष्णु ने हिमालय मे बैठी हुए अवस्था मे कई वर्षो तक कठोर तपस्या की।यह बद्रीनाथ ही था।जहा भगवान विष्णु ने पश्चाताप किया। कहते है भगवान विष्णु शय्या पर लेटे हुए थे।उनकी पत्नी लष्मी उनके पैर दबा रही थी।विष्णु ने हिमालय मे बैठी हुए अवस्था मे कई वर्षो तक कठोर तपस्या की।यह बद्रीनाथ ही था। जहा भगवान विष्णु ने पश्चाताप किया।कहते है भगवान विष्णु शय्या पर लेटे हुए थे।उनकी पत्नी लष्मी उनके पैर दबा रही थी |इतने मे वह से गुजर रहे एक ज्ञानी संत काफी नाराज हो गए।उसने देखा भगवान विष्णु स्वम आराम से लेते हुए है।माता लष्मी उनके पैर दबा रही थी।उन्होंने भगवान विष्णु की आलोचना की। भगवान विष्णु ने बैठी हुए अवस्था मे कई वर्षो तक कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।यह बद्रीनाथ धाम ही था ।यही कारण है यहाँ रखी हुए मूर्ति बैठी हुए अवस्था मे है।

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यहाँ बद्रीनाथ मे भगवान विष्णु ने नारद ऋषि से कहा था।नर और नारायण उनके अपने ही रूप है।आज तक बद्रीनाथ का क्षेत्र योगिओ और ऋषि मुनियो को आकर्षित करता है।जो यहाँ के पूर्ण और शांत वातावरण मे तपस्या करने आते है।लोग कहते है नारद मुनि आज भी इस बद्रीनाथ धाम मे अस्त्राक्षर मंत्र से किसी जगह सर्व शक्तिमान ईश्वर की पूजा कर रहे है।मंदिर को टूटफूट,आपदा , प्राकतिक व् अप्राकतिक कारणों के चलते कई बार नवीकरण के दौर से गुजरना पड़ा। सन1803 ईसवी मे जयपुर के राजा ने भूकंप के कारण बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके मंदिर का पुनः निर्माण करवाया।

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मंदिर लगभग 50 फ़ीट ऊंचा है ।जिसके शीश पर लगा गुम्मद जो सोने की परत से ढका हुआ है।सामने की दीवार ठोस पत्थर से बनी हुए है।जिसमे मेहराभी खिड़किया है।एक विस्त्रवित सीढ़ियां मंदिर के प्रवेश द्वार तक जाती है।मंदिर के वास्तु और अनूठी कला का प्रदर्शन है।सर्वप्रथम जैसे ही आप मंदिर के अहाते मे प्रवेश करेंगे सभा भवन मे आएंगे।यह एक विशाल हवा युक्त भवन है।यह गरभ ग्रह यानि मुख्या मंदिर तक जाता है। मंडप हॉल से आप गरब ग्रह तक प्रवेश करेंगे।यहाँ मुख्य प्रतिमा रखी हुए है।मंदिर के चारो और कई मुर्तिया पूजा करने के लिए स्थपित है।इनमे नर नारायण अर्थात भगवान विष्णु का जुड़वा अवतार जिन्होंने बद्रीनाथ मे वर्षो तपस्या की है।नरसिम्हा अर्थात भगवान विष्णु का चौथा अवतार है।भगवान विष्णु की पत्नी माँ लष्मी,देव ऋषि नारद ,भगवान गणेश ,कुबेर ,गरुण अर्थात नर नारायण का वाहन . नव माँ दुर्गा आदि है।


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सुबह 4:30 बजे खुलता हैऔर 1 :30 बजे बंद होता है |यह शाम को 4 बजे पुनः खुलता है और रा को 9 बजे दैवीय गीत गोविन्द गायन से बंद होता है। यहाँ अनेक प्रकार की पूजा अर्चना होती है। यहाँ विशेष पूजा एवं प्रार्थना तप्तकुण्ड मे पवित्र दीप के साथ शुरू होती है।

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तप्तकुण्ड सल्फर युक्त गरम जल का एक गरम झरना है। यह मंदिर भवन के ठीक नीचे स्थित है ।यह इस क्षेत्र का महान आश्चर्य है।तप्तकुण्ड का गरम झरना बर्फ जैसे अलकनंदा नदी के किनारे बसते है।कुंड के पानी का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस साल भर रहता है।बद्रीनाथ का तापमान ज्यादातर 9-10 डिग्री सेल्सियस रहता है।ठण्ड मे तो शून्य डिग्री सेल्सियस से भी नीचे हो जाता है।

What is tapt kund badrinath

मंदिर मे जाने से पहले तीर्थ यात्री तप्तकुण्ड के पवित्र जल मे स्नान करते है।स्नान के बाद आप पूजा अर्चना और आरती के बाद आप आप मंदिर मे जाते है।सुबह मे से होने वाली पूजा मे से एक अभिषेक पूजा ,महाभिषेक और गीता पाठ है।शाम की पूजा मे ,शाम की आरती है और फिर गीत गोविन्द का गायन। यह मंदिर के बंद होने से पहले गाया जाता है।यहाँ बद्रीनाथ मंदिर के प्रसाद के रूप मे मिश्री पोंगल ,तुलसी और सूखे मावे का का मिश्रण किया जाता है। प्रत्येक साल नवंबर तक बद्रीनाथ शहर कड़ाके की ठण्ड और हिमपात के कारण बंद हो जाता है।

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बद्रीनाथ मंदिर साल मे 6 महीना नवंबर दीपावली से चैत्र पूर्णिमा मौसम खराब होने के कारण बंद रहता है ।उन दिनों श्रद्धालु लोग भगवान बद्रीनाथ की प्रतिमा को आदि गुरु शंकरचाय द्वारा स्थापित ज्योतिया मठ मे ले जाते है।जो हिमालय पहाड़ के नंदादेवी जीव आरक्षित क्षेत्र मे स्थित है। बद्रीनाथ का काफी धार्मिक महत्त्व है।यह न केवल बद्रीनाथ तीर्थ को लेकर बल्कि अन्य कारणों से भी है।भगवान शिव से लेकर नर नारायण और विष्णु से लेकर वेद व्यास इसके अलावा भगवान गणेश से लेकर पाण्डव।ये सभी कभी इस श्रेत्र मे आये इनके निशान इसमें आज भी है।

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बद्रीनाथ की यात्रा जितनी चमत्कारिक है उतनी ही दिव्या है यहाँ का खजाना।यह बद्रीनाथ से कुछ किलोमीटर आगे माना के एक छोटे मे शहर मे स्थित है। यह पवित्र नदी सरस्वती के किनारे रमणीय हिमालय की गोद मे स्थित है।यहाँ आप 2 अति प्राचीन गुफाये(वेदव्यास गुफा,गणेश गुफा ,माना उत्तराखंड ) पाएंगे।यह गुफाये जो की हिन्दू धरम के आदरणीय ग्रन्थ महाभारत की रचना के साक्षी है। वेदव्यास ने अपने गुरु ऋषि कल्पतरु उनके सपने मे आये थे। उन्होंने उनके आदेश से महाकाव्य महाभारत और वेदो की रचना करी।

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यह गुफा 50111 साल पुरानी है|यहाँ बैठकर शिवेंद्र व्यास ने महाभारत का वरन भगवान श्री गणेश के सामने किया था| अगर आप दयँ से देखो तो पीछे वाली खड़क आपको पुरानी हस्तप्रत जैसे नज़र आएगी हिन्दू महा काव्य महाभारत मे पांडव और कौरव के बीच हुए युदृ का विस्तार है।जिसके अंतर्गत विष्णु के अवतार श्री कृष्णा दिया गया भगवत गीता का ज्ञान भी है महर्षि व्यास को भी भगवान विष्णु का पुनः जन्म माना जाता है।महाभारत के अतिरक्त महर्षि व्यास ने 18 पुराणों ब्रह्मसूत्रो की रचना की ।उन्होंने वेदो को 4 भाग मे बांटा। ये वेद है-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ।इस गुफा के बारे मे विश्वास किया जाता है की आदि गुरु शंकराचार्य भी वेद व्यास से मिले थे।

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ये गणेश गुफा है।इस गुफा के बारे मे विश्वास किया जाता है की आदि गुरु शंकरराचार्य भी महर्षि व्यास से मिले थे।वास्तव मे ये एक गणेश गुफा है।कहा जाता है की गणेश जी ने वेद व्यास से महाभारत का वरणं सुनने के बाद यही बैठकर लिखा था। महर्षि वेद व्यास अपनी गुफा मे बैठे हुए। भगवान गणेश अपनी गुफा मे बैठे हुए वेद व्यास जी जो कुछ भी बोल रहे थे।उसे भगवान गणेश लिख रहे थे।एक द्रश्टांग यह भी है की महाभारत के समय पास मे बह रही नदी की तेज धारा की आवाज से उनका ध्यान भंग हुआ।उसके बाद उन्होंने सरस्वती नदी को श्राप दे दिया।उन्होंने कहा की वे लुप्त हो जाये |यही कारण है कुछ दुरी के बाद सरस्वती नदी अलकनंदा नदी मे विलीन हो जाती है।इस तरह सरस्वती के रूप मे अपना अस्तिव्त खो देती है।

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badrinath dham history in hindi-ऐसा भी कहा जाता है की जब पांडव स्वर्ग की तरफ जा रहे थे। द्रोपदी नदी को पार नहीं कर पा रही थी | तब सबसे शक्तिशाली भीम ने एक पुल बनाया था।यह जगह भीम पुल के नाम से भी जानी जाती है।यह भीम पुल प्राकतिक तरीके से नदी पर खड़ा है।यह चट्टान के नीचे गिरते हुए एक शानदार नज़ारा पेश करता है।ऐसा विश्ववास किया जाता है की सबसे शक्तिशाली भीम जिसमे 100 हाथियों की ताक़त थी। ऐसे बहुत सारे रहस्य जुड़े हुए है बद्रीनाथ से।

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